सुल्ला के विधायक विपिन सिंह परमार ने आज एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश अपने इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक और प्रशासनिक संकटों में से एक से गुजर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि यह संकट न तो किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम है और न ही संसाधनों की कमी का, बल्कि यह प्रशासनिक विफलता, जवाबदेही की कमी और घोर वित्तीय कुप्रबंधन का सीधा परिणाम है।
परमार ने कहा कि हालांकि केंद्र सरकार ने राज्य को वित्तीय संकट से उबरने में मदद करने के लिए हजारों करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की थी, लेकिन कांग्रेस सरकार अभी तक यह बताने में विफल रही है कि यह पैसा कहां गया।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि केंद्र सरकार ने आपदा के बाद की जरूरतों के आकलन (पीडीएनए) के तहत 601 करोड़ रुपये और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ) के माध्यम से मकानों, सड़कों, पुलों के निर्माण और पुनर्वास कार्यों के लिए 402 करोड़ रुपये जारी किए थे। उन्होंने आरोप लगाया, “लेकिन आज न तो मकान बने हैं, न ही सड़कों में सुधार हुआ है, और पुनर्वास योजना का कोई नामोनिशान नहीं है। धनराशि प्राप्त तो हुई, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ है, जो स्पष्ट रूप से एक बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है।”
परमार ने कहा कि राज्य सरकार पहले ही 40,100 करोड़ रुपये से अधिक का ऋण ले चुकी है, फिर भी अस्पतालों, स्कूलों, युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों या बुनियादी ढांचे में कोई सुधार नहीं हुआ है। उन्होंने पूछा, “अगर कोई स्पष्ट विकास नहीं हुआ है, तो यह भारी ऋण राशि कहां गई? क्या चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए राज्य को कर्ज में धकेला जा रहा है?”
उन्होंने बिगड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि थुरल अस्पताल सरकारी विफलता का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है। उन्होंने कहा, “भाजपा सरकार के कार्यकाल में अस्पताल के लिए 20 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे और वरिष्ठ डॉक्टरों की नियुक्ति की गई थी। लेकिन मौजूदा सरकार के तहत अस्पताल अधूरा पड़ा है, काम ठप है और मरीज इलाज की तलाश में भटकने को मजबूर हैं। न डॉक्टर हैं, न कर्मचारी – सिर्फ खोखले वादे हैं।”

