पंजाब, किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने जा रहा है, जिसमें वह केंद्र सरकार के यमुना बेसिन परियोजना को राज्य की सहमति के बिना आगे बढ़ाने के फैसले पर सवाल उठाएगा और नदी के जल में हिस्सेदारी के अपने दावे को दोहराएगा। पंजाब जल संसाधन विभाग के सूत्रों कि महाधिवक्ता कार्यालय से याचिका के मसौदे को मंजूरी देने का अनुरोध किया गया है। इस दस्तावेज़ की पहले ही पंजाब के महाधिवक्ता रह चुके एक वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा जाँच की जा चुकी है।
यह कदम छह राज्यों – हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली – द्वारा यमुना की सहायक नदी टोंस नदी पर लंबे समय से लंबित 422 मेगावाट की किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ दिनों बाद उठाया गया है। 1,562 मिलियन घन मीटर तक की प्रस्तावित भंडारण क्षमता वाली इस परियोजना का उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन के अलावा सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जल उपलब्ध कराना है।
पंजाब का तर्क है कि यमुना के जल बंटवारे की मौजूदा व्यवस्था के आधार पर परियोजना को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता है क्योंकि राज्य को स्वयं नदी के सतही प्रवाह के आवंटन को नियंत्रित करने वाले 1994 के समझौते से बाहर रखा गया था। जल संसाधन विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “1972 की सिंचाई आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि पंजाब यमुना बेसिन के अंतर्गत आता है। 1992 से पंजाब केंद्र सरकार से यमुना जल आवंटन संबंधी सभी चर्चाओं में उसे शामिल करने का अनुरोध कर रहा है।”
राज्य सरकार का कहना है कि दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के बीच 12 मई, 1994 को हस्ताक्षरित यमुना जल बंटवारे के समझौता ज्ञापन में पंजाब को शामिल नहीं किया गया है। अधिकारी ने कहा, “1954 में पंजाब यमुना के दो-तिहाई जल का हकदार था, लेकिन 1994 के समझौते के तहत राज्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। इस समझौता ज्ञापन को संपूर्ण या अंतिम समझौता नहीं माना जा सकता, खासकर इसलिए क्योंकि इसके अनुच्छेद 8 में 2025 के बाद समीक्षा का प्रावधान है। इसलिए, अब आवंटन की समीक्षा की जानी चाहिए और पंजाब को उसका उचित हिस्सा मिलना चाहिए।”
पंजाब का मुख्य तर्क यह है कि यमुना, रावी और ब्यास नदियों की तरह, 1966 में राज्य के पुनर्गठन से पहले तत्कालीन पंजाब की नदी प्रणाली का हिस्सा थी। अधिकारी ने कहा, “यदि हरियाणा, रावी और ब्यास नदियों का तटीय राज्य न होते हुए भी, उत्तराधिकारी राज्य के रूप में उनका जल प्राप्त कर सकता है, तो पंजाब को भी यमुना के जल के लिए उत्तराधिकारी राज्य माना जाना चाहिए।”
पिछले पांच वर्षों में जब भी पंजाब के नदी-जल विवाद पर चर्चा हुई है, मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने बार-बार दोहराया है कि यदि गैर-तटीय राज्यों को पंजाब की नदियों का जल आवंटित किया जा सकता है, तो पंजाब भी यमुना के जल का उतना ही हकदार है। राज्य सरकार पंजाब (पुनर्गठन से पहले) और उत्तर प्रदेश के बीच 12 मार्च, 1954 को हुए समझौते पर भरोसा करेगी, जिसके तहत पंजाब यमुना के दो-तिहाई जल का हकदार था। सरकार का तर्क है कि पंजाब के पुनर्गठन से यह अधिकार स्वतः समाप्त नहीं हो सकता।
पंजाब ने पिछले साल 25 अप्रैल को अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1957 की धारा 3 के तहत केंद्र सरकार के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें यमुना जल पर अपने दावे के निपटारे के लिए एक न्यायाधिकरण के गठन की मांग की गई थी। शिकायत पर कोई कार्रवाई न होने के कारण, राज्य अब न्यायिक हस्तक्षेप पर विचार कर रहा है।
पंजाब सरकार का तर्क है कि अंतर-राज्यीय नदी जल बंटवारे को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत को लगातार लागू किया जाना चाहिए – चाहे वह तटवर्ती सिद्धांत हो या उत्तराधिकारी-राज्य सिद्धांत – और यमुना में पंजाब के दावे वाले हिस्से से इनकार करने के लिए इसे चुनिंदा रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।


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