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राहुल बोस : अभिनय से मिली पहचान, रग्बी से मिला सम्मान और समाज सेवा बनी मिसाल

Rahul Bose: Acting brought him recognition, rugby earned him respect, and his social service set an example.

27 जुलाई 1967 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में जन्मे राहुल बोस महज एक कुशल अभिनेता नहीं बल्कि एक पूर्व अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी, एक दूरदर्शी फिल्म निर्माता और एक निस्वार्थ समाज सेवक भी हैं।

बचपन में अपनी मां द्वारा बॉक्सिंग और रग्बी से परिचित कराए गए राहुल बोस ने कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल और बाद में सिडेनहैम कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी की। इसी दौरान उन्होंने पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान मंसूर अली खान पटौदी से क्रिकेट का प्रशिक्षण भी लिया और बॉक्सिंग में रजत पदक जीता। उनका असली जुनून रग्बी बना जिसके लिए उन्होंने 1998 से 2009 तक 11 वर्षों तक भारतीय राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व किया।

एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और अभिनेता के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था। 1994 से 2009 के बीच अपनी 24 फिल्मों की शूटिंग का समय उन्होंने रग्बी कैलेंडर के हिसाब से तय किया।

1998 से 2009 तक राहुल बोस ने भारतीय राष्ट्रीय रग्बी टीम के लिए 11 वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेला। 2017 में भारतीय महिला रग्बी टीम ने एशिया सेवेंस चैंपियनशिप में रजत पदक जीता। 15 अगस्त 2021 को ओडिशा सरकार ने भारतीय रग्बी टीम की स्पॉन्सरशिप शुरू की। 18 दिसंबर 2021 को राहुल बोस ने रग्बी इंडिया के अध्यक्ष का कार्यभार संभाला।

राहुल बोस का अभिनय से पहला परिचय मात्र छह साल की उम्र में स्कूल के नाटक ‘टॉम, द पाइपर्स सन’ में हुआ था। मां के निधन के बाद रेडिफ्यूजन में एक कॉपीराइटर के तौर पर काम करने वाले राहुल बोस ने फिल्म इंग्लिश, ऑगस्ट (1994) की भारी सफलता के बाद पूर्णकालिक अभिनेता बनने का फैसला किया।

व्यावसायिक सिनेमा की जगह उन्होंने हमेशा समानांतर सिनेमा को चुना। मिस्टर एंड मिसेज अय्यर, चमेली, झंकार बीट्स और विश्वरूपम जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। एक निर्देशक के तौर पर उनकी पहली निर्देशित फिल्म एवरीबडी सेज आई एम फाइन! (2001) के लिए फंड जुटाने में उन्हें महज 33 दिन लगे। इसके बाद उन्होंने पूर्णा (2017) का निर्देशन किया, जो 13 साल की उम्र में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली सबसे कम उम्र की लड़की की बायोपिक थी। इस फिल्म की शूटिंग 1 दिसंबर से 31 जनवरी के बीच की गई थी।

सिनेमा और खेल से परे राहुल बोस एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। 2004 की भीषण सुनामी के दौरान अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में राहत कार्यों ने उनके जीवन को एक नया मकसद दिया। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने ‘द फाउंडेशन’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाज से हर प्रकार के भेदभाव को मिटाना है।

फाउंडेशन के ‘प्रोजेक्ट रीच’ के माध्यम से वे भौगोलिक और राजनीतिक रूप से कटे हुए क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को देश के सर्वश्रेष्ठ स्कूलों में शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उनके ‘प्रोजेक्ट हील’ ने बाल यौन शोषण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 35,000 से अधिक शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों को प्रशिक्षित किया है।

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