N1Live National राशिद अल्वी और सैयद फरीद निजामी ने कहा, ‘जकात मस्जिदों के लिए नहीं, जरूरतमंदों के लिए है’
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राशिद अल्वी और सैयद फरीद निजामी ने कहा, ‘जकात मस्जिदों के लिए नहीं, जरूरतमंदों के लिए है’

Rashid Alvi and Syed Farid Nizami said, "Zakat is for the needy, not for mosques."

राम मंदिर चंदा विवाद के कथित मामले के बाद अब धार्मिक संस्थानों में मिलने वाले दान और उसके प्रबंधन को लेकर बहस शुरू हो गई है। इसी कड़ी में कांग्रेस नेता राशिद अल्वी और हजरत निजामुद्दीन दरगाह कमेटी के सज्जादा नशीन एवं अध्यक्ष सैयद फरीद अहमद निजामी ने मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों में मिलने वाले दान और जकात की व्यवस्था पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी।

कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि मस्जिदों में जकात नहीं दी जाती। जकात जरूरतमंद और गरीब लोगों के लिए होती है, न कि मस्जिदों के लिए। मस्जिदों का संचालन एक कमेटी करती है, जहां इमाम नमाज पढ़ाते हैं और नमाज के बाद लोग वहां से चले जाते हैं। मस्जिद के भीतर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती, जहां इस प्रकार की चोरी का सवाल खड़ा हो। मंदिर और मस्जिद की तुलना करना उचित नहीं है क्योंकि दोनों अलग-अलग आस्था के केंद्र हैं। राम मंदिर में जो कुछ हुआ, वह करोड़ों लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ है। इस मामले में गठित एसआईटी की जांच केवल दिखावा प्रतीत होती है और इससे वास्तविक दोषियों तक पहुंचना मुश्किल है।

राशिद अल्वी ने कहा कि दरगाहों के संचालन के लिए अलग-अलग कमेटियां होती हैं। वहां मिलने वाले दान का उपयोग लंगर चलाने, भोजन तैयार करने और गरीबों की सहायता जैसे कार्यों में किया जाता है। इस्लाम में किसी मजार या खानकाह की पूजा की अनुमति नहीं है। श्रद्धालु यदि चादर चढ़ाते हैं तो बाद में उन्हें जरूरतमंदों में बांट दिया जाता है और यदि लोग कुछ धनराशि देते हैं तो उसका उपयोग भी गरीबों के हित में किया जाता है। अब तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है जिसमें किसी खानकाह या दरगाह में इस प्रकार की चोरी हुई हो।

हजरत निजामुद्दीन दरगाह कमेटी के सज्जाद नशीन एवं अध्यक्ष सैयद फरीद अहमद निजामी ने कहा कि मस्जिदों और मदरसों को मिलने वाली धनराशि नियमित रूप से उनके संचालन और विद्यार्थियों के कल्याण पर खर्च कर दी जाती है। दरगाहें जकात का पैसा स्वीकार नहीं करतीं। लोग जकात की राशि मदरसों को देते हैं, जहां उसका उपयोग छात्रों की शिक्षा, भोजन और रहने की व्यवस्था पर किया जाता है। जिन खानकाहों में सादात और सैय्यद परिवार जुड़े होते हैं, वहां जकात लेना धार्मिक रूप से उचित नहीं माना जाता। यदि कोई उन्हें जकात देना भी चाहे तो वे उसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार उन पर जकात लेना वर्जित है।

सैयद फरीद अहमद निजामी ने आगे कहा कि कब्रिस्तानों और मस्जिदों के लिए जो दान मिलता है, वह संबंधित कार्यों में खर्च हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति लंगर के लिए दान देता है तो उसी उद्देश्य में उसका उपयोग किया जाता है। इन संस्थानों में बहुत बड़े स्तर पर धन नहीं आता, बल्कि जो भी राशि मिलती है, उसे आवश्यकता के अनुसार खर्च कर दिया जाता है। यदि कहीं कोई अलग मामला सामने आया है तो उसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए और अन्य धार्मिक संस्थानों से उसकी तुलना नहीं की जानी चाहिए।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के उस बयान पर, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि ट्रस्ट में कोई मुस्लिम होता तो उसका एनकाउंटर कर दिया जाता, निजामी ने कहा कि वह किसी व्यक्ति की नीयत पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय होता है या उसका घर बिना उचित कारण तोड़ा जाता है तो यह गंभीर अन्याय है। वहीं, यदि कोई दोषी होते हुए भी जानबूझकर छोड़ दिया जाता है तो वह भी उतना ही बड़ा अन्याय है।

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