July 7, 2026
Entertainment

यादों में ‘जगदीप’: इश्तियाक अहमद जाफरी की ‘सूरमा भोपाली’ का किरदार आज भी हिंदी सिनेमा की है पहचान

Remembering ‘Jagdeep’: Ishtiaq Ahmed Jafri’s character ‘Soorma Bhopali’ remains an iconic figure in Hindi cinema to this day.

29 मार्च 1939 को जन्मे ‘जगदीप’ (पूरा नाम इश्तियाक अहमद जाफरी) के परिवार की माली हालत उनके पिता के असमय देहांत और 1947 के भारत-विभाजन की उथल-पुथल के कारण पूरी तरह बिखर गई थी।

ऐसा कहा जाता है कि साल 1951 में निर्देशक बीआर चोपड़ा अपनी पहली फिल्म ‘अफसाना’ के लिए कुछ बाल कलाकारों को तलाश रहे थे। सड़कों पर काम ढूंढते हुए इश्तियाक अहमद जाफरी को एक एजेंट मिला, जिसने उन्हें फिल्म के एक नाटक दृश्य में ताली बजाने के बदले 3 रुपए की दिहाड़ी की पेशकश की।

जब सेट पर मुख्य बाल कलाकार कठिन उर्दू संवाद बोलने में नाकाम रहा, तो उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ रखने वाले इश्तियाक ने तुरंत अपनी मूंछ-दाढ़ी लगाकर संवाद बोलने की जिम्मेदारी उठाई। इस बेमिसाल आत्मविश्वास से प्रभावित होकर बीआर चोपड़ा ने उनकी फीस दोगुनी यानी 6 रुपए कर दी और यहीं से सिनेमा के इस नायाब हीरे की खोज हुई।

शुरुआती दौर में जगदीप ने एक गंभीर और भावुक बाल कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। फिल्म ‘फुटपाथ’ (1953) में उन्होंने महान अभिनेता दिलीप कुमार के बचपन का किरदार निभाया, जहां बिना ग्लिसरीन के सजीव रोने के दृश्य से प्रभावित होकर दिलीप कुमार ने उन्हें 100 रुपए का नकद पुरस्कार दिया था। उनकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनकी फिल्म ‘हम पंछी एक डाल के’ (1957) की सफलता के बाद बेहद प्रभावित हुए। इस फिल्म में जगदीप ने’महमूद’ नाम के एक स्कूली छात्र और मुख्य बाल कलाकार (मास्टर रोमी) के सहपाठी की भूमिका निभाई थी।

लेकिन उनके करियर का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब दिग्गज निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें अपनी क्लासिक फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ (1953) में जूता पॉलिश करने वाले ‘लालू उस्ताद’ का कॉमिक रोल सौंपा। इसके बाद जगदीप ने हमेशा के लिए कॉमेडी की राह चुन ली।

साल 1968 की हिट फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ ने उन्हें एक संपूर्ण हास्य अभिनेता के रूप में स्थापित किया, लेकिन साल 1975 की कालजयी फिल्म ‘शोले’ में उन्होंने ‘सूरमा भोपाली’ की हास्य भूमिका निभाई थी, जबकि 1994 में ‘अंदाज अपना अपना’ में बांकेलाल भोपाली बने थे।

जगदीप ने ‘पुराना मंदिर’ (1984) के डाकू ‘मच्छर सिंह’ से लेकर प्रियदर्शन की फिल्म ‘मुस्कुराहट’ (1992) के ‘बद्रीप्रसाद चौरसिया’ जैसे जटिल किरदारों को अपनी अद्भुत कॉमिक टाइमिंग से जीवंत किया। उन्होंने अपनी कला की अनमोल विरासत अपने बेटों (अभिनेता जावेद जाफरी, टेलीविजन निर्माता नावेद जाफरी) और अपने पोते मीजान जाफरी को सौंपी।

गिरते स्वास्थ्य के कारण, 8 जुलाई 2020 को इस महान कलासाधक ने मुंबई स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली।

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