September 28, 2026
National

रोहित पवार ने किसानों के लिए तुरंत मदद की मांग की, कहा-‘1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी बदतर हालात’

महाराष्ट्र सरकार पर कड़ा हमला करते हुए एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के विधायक रोहित पवार ने सोमवार को प्रशासन पर आरोप लगाया कि वह राज्य में फैली भयानक सूखे की स्थिति से आंखें मूंदे हुए हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में फसल के नुकसान के विस्तृत आंकड़े पेश करते हुए, उन्होंने दावा किया कि राज्य को 77,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का भारी कृषि नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि खेती-बाड़ी की मौजूदा बदहाली और बारिश की भारी कमी ने ग्रामीण महाराष्ट्र को ‘1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी बदतर’ संकट में धकेल दिया है।

रोहित पवार ने बताया कि कैसे मानसून के अनियमित पैटर्न और उस पर ‘अल नीनो’ के असर ने रिकवरी की उम्मीदों को तोड़ दिया जबकि जुलाई में हुई भारी बारिश ने राज्य प्रशासन को बेफिक्र कर दिया था। कुल बारिश 783.6 मिमी दर्ज की गई जो कुल मिलाकर 20.50 प्रतिशत की कमी दिखाती है।

क्षेत्रवार कमी की बात करें तो नासिक डिवीजन में 34.30 प्रतिशत, नागपुर डिवीजन में 25 प्रतिशत और कोंकण डिवीजन में 9.80 प्रतिशत कमी दर्ज की गई।

रोहित पवार के अनुसार, किसानों ने बुवाई पर 95,500 करोड़ रुपए खर्च किए थे, जिससे 1,28,866 करोड़ रुपए की पैदावार की उम्मीद थी। इसके बजाय, सोयाबीन, कपास, अरहर (तुअर) और मक्का जैसी मुख्य खरीफ फसलों के बड़े पैमाने पर बर्बाद होने से वह सारा निवेश डूब गया।

पवार ने कहा, “मेरे अपने निर्वाचन क्षेत्र कर्जत-जामखेड़ में ही बारिश सामान्य की तुलना में 40 प्रतिशत हुई है यानी 60 प्रतिशत की भारी कमी। किसान अपनी खेती की बुनियादी लागत भी वसूल नहीं पाए हैं। उनकी कमर टूट गई है।”

सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को उजागर करने के लिए रोहित पवार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जालना के एक प्रभावित किसान को लाइव वीडियो कॉल किया। किसान ने बताया कि प्रीमियम भरने के बावजूद फसल बीमा का पैसा देने से पूरी तरह इनकार कर दिया गया। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि योजना बंद हो गई है।

किसान ने यह भी कहा कि फसल के नुकसान का आकलन करने के लिए राज्य के किसी सर्वेक्षक या कृषि अधिकारी ने खेतों का दौरा नहीं किया।

रोहित पवार ने राज्य में फसल बीमा लागू करने के तरीके की कड़ी आलोचना की। उन्होंने बताया कि जहां किसानों, राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने मिलकर निजी कंपनियों को बीमा प्रीमियम के तौर पर 2,394 करोड़ रुपए दिए, वहीं किसानों को मुआवजे के रूप में बमुश्किल 1,938 करोड़ रुपए मिले यानी बीमा कंपनियों ने मुनाफा कमाया जबकि किसानों को नुकसान उठाना पड़ा।

सरकार की राहत योजनाओं को सतही बताते हुए, पवार ने राज्य के उपायों का बिंदु-वार विश्लेषण किया। उन्होंने राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) से प्रति हेक्टेयर 8,500 रुपए (अधिकतम 17,000 रुपए) की सहायता को ‘किसानों का अपमान’ बताया, जबकि उत्पादन लागत 50,000 से 60,000 रुपए प्रति एकड़ तक पहुंच जाती है; उन्होंने प्रति हेक्टेयर कम से कम 50,000 रुपए की एकमुश्त राहत की मांग की।

उन्होंने जमीन के लगान को माफ करने को एक दिखावा बताया, जिससे हर किसान को केवल 400 से 500 रुपए का मामूली फायदा होता है।

उन्होंने सूखे से प्रभावित जिलों में कॉलेज की ट्यूशन फीस पूरी तरह माफ करने की मांग की, राज्य द्वारा फीस में छूट के लिए आवंटित 30 करोड़ रुपए को अपर्याप्त बताते हुए और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के परिवारों के लिए 25,000 रुपए की सीधी नकद सहायता की मांग की।

उन्होंने महाराष्ट्र राज्य विधानसभा का एक विशेष सत्र बुलाने की भी मांग की जैसा कि पड़ोसी राज्य कर्नाटक ने किया था ताकि सूखे से जुड़ी राहत पर विशेष रूप से चर्चा हो सके, कीटनाशकों की आसमान छूती कीमतों की जांच हो सके, किसानों को बेचे गए घटिया बीजों के बारे में दर्ज 17,000 से ज्यादा शिकायतों की जांच हो सके। साथ ही, पिछले तीन सालों से अटके ‘कृषि समृद्धि योजना’ के तहत 15,000 करोड़ रुपए के बकाया फंड को जारी किया जा सके।

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