July 21, 2026
Entertainment

नेशनल अवॉर्ड मिलने पर बोले स्क्रीनराइटर योगेश देशपांडे-‘अच्छी कहानी के लिए मेहनत, रिसर्च और सच्चाई सबसे जरूरी’

Screenwriter Yogesh Deshpande on winning the National Award: “Hard work, research, and authenticity are paramount for a good story.”

18 जुलाई को 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स 2026 के विजेताओं का ऐलान किया गया। इसमें स्क्रीनराइटर योगेश देशपांडे मराठी फिल्म ‘स्वरगंधर्व सुधीर फड़के’ के लिए बेस्ट अडैप्टेड स्क्रीनप्ले का अवॉर्ड दिया गया। अवॉर्ड से सम्मानित होने पर योगेश देशपांडे ने कहा है कि राष्ट्रीय पुरुस्कार मिलना किसी भी कलाकार और लेखक के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। एक अच्छी कहानी लिखने के लिए लगातार सीखना, अध्ययन करना और किरदारों की सच्चाई को समझना बेहद जरूरी है।

आईएएनएस से बातचीत में योगेश देशपांडे ने कहा, ”भारतीय सिनेमा में कहानी कहना अपने आप में एक खास कला है। अगर कोई लेखक पूरी ईमानदारी से मेहनत करता है, अच्छी रिसर्च करता है और कहानी को सही तरीके से पेश करता है, तो उसे पहचान जरूर मिलती है। स्क्रीनराइटिंग सिर्फ शब्द लिखने का काम नहीं है, बल्कि किसी किरदार और उसकी पूरी दुनिया को समझकर उसे दर्शकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी है।”

योगेश देशपांडे ने बताया कि फिल्म ‘स्वरगंधर्व सुधीर फड़के’ के दौरान उन्हें सबसे बड़ी चुनौती महान संगीतकार और कलाकार सुधीर फड़के (जिन्हें प्यार से ‘बाबूजी’ कहा जाता है) की जिंदगी पर आधारित कहानी लिखने में महसूस हुई। वह देश के बड़े संगीतकारों में से एक रहे हैं और संगीत जगत में उनका योगदान बेहद खास है। लता मंगेशकर से लेकर आशा भोसले तक कई बड़े कलाकारों के साथ उन्होंने काम किया। हिंदी और मराठी सिनेमा में उनके संगीत को आज भी लोग बेहद पसंद करते हैं।

उन्होंने कहा, ”बाबूजी जैसे बड़े व्यक्तित्व की कहानी को पर्दे पर दिखाना एक बड़ी जिम्मेदारी थी, क्योंकि लोगों के दिल में उनके लिए बहुत सम्मान है। सुधीर फड़के के बेटे श्रीधर फड़के खुद भी बड़े संगीतकार और गायक हैं। उन्होंने भी कहा था कि कहानी लिखते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि बाबूजी के जीवन से जुड़ी कोई गलत बात या गलत छवि सामने न आए।”

योगेश देशपांडे ने बताया, ”इसी वजह से मैंने करीब तीन साल तक लगातार रिसर्च की। सुधीर फड़के के परिवार से मुलाकात की, उनसे बातचीत की और हर पहलू को समझने की कोशिश की। मेरा उद्देश्य सिर्फ एक डॉक्यूमेंट्री जैसी जानकारी देना नहीं था बल्कि दर्शकों को एक ऐसा सिनेमाई अनुभव देना था, जिसमें कहानी भी मजबूत हो और किरदार की सच्चाई भी बनी रहे।”

उन्होंने कहा, ”सुधीर फड़के की जिंदगी में संघर्ष से सफलता तक का सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। एक कलाकार के रूप में उनकी यात्रा शून्य से शुरुआत करके ऊंचाई तक पहुंचने की कहानी है। ऐसे में हर सीन और हर संवाद लिखते समय यह ध्यान रखना जरूरी था कि किरदार वास्तविक लगे और दर्शकों को ऐसा महसूस न हो कि कहानी में अनावश्यक बदलाव किए गए हैं।”

योगेश ने बताया, ”फिल्म में सुधीर फड़के के संगीत को भी खास महत्व दिया गया है। उनके कई लोकप्रिय गीतों को कहानी का हिस्सा बनाया गया ताकि नई पीढ़ी भी उनके संगीत और योगदान को समझ सके। हम सुधीर फड़के के गाने सुनते-सुनते बड़े हुए हैं।” अपनी सफलता का श्रेय देते हुए योगेश देशपांडे ने अपनी फैमिली का भी धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी और बच्चे ने इस लंबे सफर में उनका पूरा साथ दिया। तीन साल तक रिसर्च और लेखन के दौरान परिवार ने उन्हें पूरा समय और सहयोग दिया।

नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद अपनी जिम्मेदारी को लेकर योगेश ने कहा कि अब एक लेखक के तौर पर उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। आगे भी वह ऐसी कहानियां लिखना चाहते हैं, जिनमें भारतीय संस्कृति, समाज और लोगों की भावनाओं की झलक दिखाई दे।

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