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‘शहरयार’ ने बदली अखलाक मुहम्मद खान की किस्मत, साहित्य सफर में दिलाई कामयाबी

Shahryar changed the fate of Akhlaq Muhammad Khan and brought him success in his literary journey.

13 फरवरी । उर्दू शायरी की दुनिया में अखलाक मुहम्मद खान उर्फ शहरयार का नाम काफी मशहूर है। उनकी शायरी में अलग गहराई होती थी। लोग उन्हें ‘शहरयार’ बुलाते थे, ‘शहरयार’ का मतलब ‘शहर का राजा’ है। वह न सिर्फ शहर के, बल्कि करोड़ों लोगों के दिलों के राजा बने। 13 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि है। इस मौके पर उनसे जुड़ी कुछ खास बातें जानते हैं।

अखलाक मुहम्मद खान का जन्म 16 सितंबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में हुआ था। उनका बचपन एक साधारण परिवार में बीता। पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ शायरी की तरफ उनका झुकाव धीरे-धीरे बढ़ता गया। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की, जहां उर्दू साहित्य का ज्ञान और गहरा हो गया।

शुरुआती दौर में जब उनकी गजलें और नज्में पत्रिकाओं में छपने लगीं, तब वह अपने असली नाम अखलाक मुहम्मद खान से ही लिखते थे। उनकी रचनाओं में सादगी, आम आदमी की पीड़ा और रिश्तों की गहराइयां होती थीं। धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि शायरी की दुनिया में एक ऐसी पहचान चाहिए, जो उनकी सोच और भावनाओं को सही रूप दे सके। इसी सोच के साथ उन्होंने ‘शहरयार’ को अपने उपनाम के तौर पर इस्तेमाल किया।

‘शहरयार’ उपनाम अपनाने के बाद उनकी शायरी को एक नई पहचान मिली। यह बदलाव उनके साहित्य सफर का नया मोड़ था। उनकी गजलें और नज्में आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी थीं। उनकी खासियत यह थी कि वह कम शब्दों में गहरी बात कह जाते थे, जिसे बच्चा-बच्चा भी समझ जाता था।

उनकी शायरी ने हिंदी सिनेमा में भी गीतों के जरिए अमिट छाप छोड़ी। फिल्म ‘उमराव जान’ के गीतों ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया। ‘दिल चीज क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती’ जैसे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं।

अपने लंबे करियर में उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। साल 2008 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 2008 में ही भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 13 फरवरी 2012 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी शायरी आज भी लोगों के बीच जिंदा है।

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