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होली के दिन शुरू हुई थी ‘द लास्ट कलर’ की यात्रा, विकास खन्ना ने सुनाया किस्सा

The journey of 'The Last Color' began on Holi, Vikas Khanna narrates the story

4 मार्च । लेखक-निर्देशक और कुक विकास खन्ना ने सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर बताया कि उनकी फिल्म ‘द लास्ट कलर’ की शुरुआत साल 2011 में होली के दिन वृंदावन से हुई थी। उस दिन रंगों से भरे त्योहार के बीच उन्होंने विधवाओं को सफेद कपड़ों में चुपचाप बैठे देखा और इसी दृश्य ने उन्हें पिंच किया था।

विकास खन्ना ने बताया कि आसपास की दुनिया गुलाबी, पीले और नीले रंगों में डूबी थी, लेकिन इन महिलाओं को एक भी रंग की छाया नहीं मिली थी। इस दृश्य ने उनकी आत्मा को गहरी चोट पहुंचाई और उन्होंने उसी पल एक छोटी कहानी लिखी, जो बाद में उपन्यास और फिर फिल्म ‘द लास्ट कलर’ बन गई।

उन्होंने बताया कि यह फिल्म उनकी सोच से कहीं ज्यादा आगे गई। फिल्म का पहला लुक कान्स फिल्म फेस्टिवल में लॉन्च हुआ। इसके बाद लगभग 100 अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग हुई। यूनाइटेड नेशंस हेडक्वार्टर में स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान स्टैंडिंग ओवैशन मिला। यूएस कैपिटल वाशिंगटन डीसी में उन्हें विधवाओं के लिए बेहतर रोजगार और सम्मान की वकालत करने का न्योता मिला। वह ग्लोबल विडोज के साथ विधवाओं के लिए ग्लोबल एंबेसडर बन गए।

फिल्म को साल 2020 के एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए एलिजिबल घोषित किया गया और यह अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हुई, लेकिन विकास खन्ना के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि तारीफ नहीं, बल्कि यह सीख थी कि किसी को भी त्योहार से जोड़ने की ताकत कितनी बड़ी है। उन्होंने कहा, “किसी को रंग, खुशी और उत्सव से जोड़ना सबसे महत्वपूर्ण है। हर कोई इसका हकदार है।”

इस विश्वास ने बाद में उनकी पहल ‘बंगलो’ की नींव रखी, जहां कोई भी सेलिब्रेशन तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक हर व्यक्ति टेबल पर न बैठ जाए। आज भले ही वह फिजिकली दुबई में हों, लेकिन उनकी रुह वृंदावन में है, जहां हर मुट्ठी में गुलाल और उन विधवाओं में जो आखिरकार रंग पहन पाईं उनके लिए शुभकामनाएं हैं।

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