October 10, 2026
National

‘पिछली कमलनाथ सरकार की अधूरी तैयारी का खामियाजा भुगत रहा ओबीसी वर्ग’, आरक्षण के मुद्दे पर मप्र भाजपा का निशाना

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मध्य प्रदेश इकाई ने हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण को लेकर मिली हार के लिए पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की अपर्याप्त तैयारी को जिम्मेदार ठहराया है। भाजपा ने कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार ओबीसी वर्ग के हितों की रक्षा के लिए इस आदेश की समीक्षा करेगी।

मध्य प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा, “जो भी गलतियां हुई हैं, उनका पूरा दोष कांग्रेस और कमलनाथ पर जाता है। उस समय 2019 में कमलनाथ की सरकार सत्ता में थी और कमलनाथ इसे बिना किसी पूर्व तैयारी के लाए थे, और आज मध्य प्रदेश और पूरा पिछड़ा वर्ग समाज उस अधूरी तैयारी का खामियाजा भुगत रहा है।”

उन्होंने आरोप लगाए कि कांग्रेस पार्टी ने कभी ओबीसी समाज की चिंता नहीं की। 1955 में डीबी कालेलकर समिति बनी, चार-पांच दशकों तक कांग्रेस ने इस पर विचार ही नहीं किया। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद उस समिति की सिफारिशों को लागू किया गया और पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया।

सुरेंद्र शर्मा ने यह भी कहा कि मंडल कमेटी की सिफारिशों को भी कांग्रेस ने लागू नहीं किया था। जब केंद्र में वीपी सिंह के नेतृत्व में भाजपा के गठबंधन वाली सरकार थी, तब मंडल कमेटी की शर्तें लागू हुईं। इसलिए आरक्षण की चिंता हमने की। गरीबों, पिछड़ों और वंचितों के अधिकारों की चिंता भाजपा ने की।

भाजपा उपाध्यक्ष ने कहा कि मध्य प्रदेश को पिछड़े वर्ग के चार मुख्यमंत्री हमारी पार्टी ने दिए। कांग्रेस बताए कि क्या उसने कभी पिछड़ा वर्ग से कोई मुख्यमंत्री दिया। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, वहां सिर्फ 18 प्रतिशत आरक्षण है। इसलिए कांग्रेस की कथनी और करनी में अंतर है।

सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि निश्चित तौर पर हाईकोर्ट का निर्णय विपरीत आया है, लेकिन इसकी प्रति आने के बाद सरकार समीक्षा करेगी। हर वर्ग के अधिकारों की सुरक्षा राज्य की मोहन यादव की सरकार करेगी।

बता दें कि जबलपुर हाईकोर्ट ने पिछले दिन राज्य में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े विवाद पर फैसला दिया। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य में ओबीसी के लिए आरक्षण 14 फीसदी ही रहेगा। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत करने के लिए ठोस कारण नहीं मिले, जिससे 50 प्रतिशत की सीमा पार करना जरूरी साबित हो।

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