April 14, 2026
Entertainment

जब ‘दो बीघा जमीन’ की शूटिंग देख गुस्से में आ गई थी भीड़, बलराज साहनी-निरूपा रॉय को सुनाई थी खरी खोटी

When the crowd got angry after watching the shooting of ‘Do Bigha Zameen’, they scolded Balraj Sahni and Nirupa Roy.

14 अप्रैल । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं, जिनकी एक्टिंग इतनी सच्ची और जीवंत होती थी कि दर्शक उन्हें पर्दे पर देखकर भूल जाते थे कि यह केवल फिल्म का सीन है। ऐसे ही दमदार अभिनेता थे बलराज साहनी। उनकी अभिनय शैली इतनी असली लगती थी कि लोग उन्हें असल जिंदगी का किरदार समझ बैठते थे।

इसी सच्ची एक्टिंग का एक दिलचस्प किस्सा साल 1953 में रिलीज हुई क्लासिक फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ से जुड़ा है। इस किस्से को खुद अभिनेत्री निरूपा रॉय ने एक इंटरव्यू में सुनाया था। निरूपा रॉय ने बताया था, “फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ की शूटिंग कोलकाता में चल रही थी। बिमल रॉय निर्देशक थे। फिल्म में मुझे और बलराज साहनी को पति-पत्नी का रोल मिला था। एक सीन में हमें ट्राम के पास से सड़क पार करनी थी। निर्देशक ने बताया कि कैमरा टैक्सी में छिपाकर रखा जाएगा और हम दोनों को सामान्य तरीके से रास्ता पार करना है।”

उन्होंने आगे बताया कि जैसे ही शूटिंग शुरू हुई और बलराज साहनी सड़क पार कर रहे थे, उन्हें हल्की चोट लग गई। यह देखते ही वहां खड़ी भीड़ भड़क उठी। लोग गुस्से में चिल्लाने लगे और बलराज साहनी व निरूपा रॉय को खरी-खोटी सुनाने लगे। भीड़ उन्हें समझा रही थी कि सड़क पार करने का तरीका यह नहीं होता।

निरूपा रॉय हंसते हुए कहती हैं, “हम दोनों हैरान थे। हमें भीड़ को यह कैसे बताते कि हम फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं? बलराज साहनी की एक्टिंग इतनी सच्ची थी कि लोग समझ ही नहीं पाए कि यह केवल अभिनय है। उन्हें लगा कि कोई असली आदमी अपनी पत्नी के साथ लापरवाही से सड़क पार कर रहा है।”

बलराज साहनी का असली नाम युधिष्ठिर साहनी था। उनका जन्म 1 मई 1913 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता आर्य समाज से जुड़े थे। बचपन से ही अभिनय का शौक रखने वाले बलराज साहनी इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन से जुड़े और 1946 में फिल्म ‘इंसाफ’ से हिंदी सिनेमा में डेब्यू किया।लेकिन असली पहचान उन्हें बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ से मिली। इस फिल्म में किसान की भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। फिल्म को कान्स फिल्म फेस्टिवल में भी सराहा गया।

बलराज साहनी मार्क्सवादी विचारधारा के थे। उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा जताई थी कि उनकी अंतिम यात्रा में उनके शरीर पर लाल झंडा डाला जाए। उनके बेटे परीक्षत साहनी ने किताब ‘द नॉन-कॉन्फॉर्मिस्ट’ में बताया कि उनके पिता उनके सबसे अच्छे दोस्त थे। बलराज साहनी ने परीक्षत से कहा था – “मुझे पिता मत समझो, मुझे अपना दोस्त समझो।”

बलराज साहनी को ‘धरती के लाल’, ‘छोटी बहन’, ‘काबुलीवाला’, ‘वक्त’ और ‘गर्म हवा’ जैसी यादगार फिल्मों के लिए आज भी याद किया जाता है।

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