लाहौल-स्पीति में गीपांग गाथ ग्लेशियर से संभावित खतरे के मद्देनजर, ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (जीएलओएफ) की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है, जो आपदा तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गीपांग गाथ ग्लेशियर में जीएलओएफ प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली का सफल क्षेत्रीय कार्यान्वयन हिमालयी क्षेत्र में आपदा तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में एक प्रयास है।
हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के सदस्य सचिव पुष्पेंद्र राणा ने कहा, “यह अग्रणी पहल आपदा के प्रति प्रतिक्रियात्मक रवैये से हटकर सक्रिय, विज्ञान-आधारित जोखिम निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की ओर बढ़ने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।” उन्होंने आगे कहा, “हमारी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि वैज्ञानिक निगरानी समय पर चेतावनी, प्रभावी स्थानीय तैयारी और अंततः मानव जीवन और आजीविका की सुरक्षा में परिणत हो।”
लाहौल और स्पीति में लगभग 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन हिमनदी झील, हिमाचल प्रदेश के सबसे गंभीर हिमनदी बाढ़ के खतरों में से एक के रूप में तेजी से उभर रही है, और पिछले तीन दशकों में इसके नाटकीय विस्तार ने संभावित रूप से विनाशकारी हिमनदी बाढ़ (जीएलओएफ) की आशंकाओं को बढ़ा दिया है।
1989 में 36.49 हेक्टेयर में फैली यह झील 2022 तक बढ़कर 101 हेक्टेयर से अधिक हो गई थी। इसके आकार और जल स्तर में हुई तीव्र वृद्धि ने निचले इलाकों में बसी बस्तियों के लिए खतरा बढ़ा दिया है, जिसके चलते जिला प्रशासन ने निगरानी, तैयारी और निकासी योजना को और भी गहन कर दिया है।
झील से मात्र 11 किलोमीटर नीचे की ओर स्थित सिसू बस्ती को तत्काल खतरा है। अचानक नाला टूटने की स्थिति में, बाढ़ की लहर सिसू नाले से होते हुए चंद्र नदी गलियारे की ओर बढ़ेगी, जिससे सिसू बस्ती सबसे अधिक खतरे में होगी, उसके बाद गोशाल, तांडी और संसारी सीमा तथा मनाली-लेह राजमार्ग गलियारे की ओर स्थित अन्य बस्तियां प्रभावित होंगी।
राणा ने कहा कि बेहद चुनौतीपूर्ण भूभाग और मौसम की स्थितियों में निगरानी उपकरणों की तैनाती वैज्ञानिक संस्थानों, तकनीकी विशेषज्ञों, जिला प्रशासन, आपदा प्रतिक्रिया टीमों और फील्ड कर्मियों के समर्पण को दर्शाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का पिघलना तेज हो रहा है और हिमनदी झीलों से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं, ऐसे में संवेदनशील हिमालयी समुदायों की सुरक्षा के लिए वास्तविक समय की निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में निवेश करना तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।


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