N1Live National अल्मोड़ा की शांत वादियों में विराजमान हैं बाल भोलेनाथ, जानिए श्री जागेश्वर महादेव मंदिर का पौराणिक इतिहास
National

अल्मोड़ा की शांत वादियों में विराजमान हैं बाल भोलेनाथ, जानिए श्री जागेश्वर महादेव मंदिर का पौराणिक इतिहास

Bal Bholenath resides in the serene valleys of Almora; discover the mythological history of the Shri Jageshwar Mahadev Temple.

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की शांत वादियो में ‘श्री जागेश्वर महादेव मंदिर’ विराजमान है। सदियों पुराना यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है बल्कि, अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है।

गुरुवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर की विशेषता पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का भव्य वीडियो पोस्ट कर लिखा, “अल्मोड़ा जिले के घने देवदार के जंगलों के बीच बसा, देवाधिदेव महादेव को समर्पित श्री जागेश्वर महादेव मंदिर, एक बहुत ही मनमोहक तीर्थस्थल है जो लाखों भक्तों की अटूट आस्था का एक बड़ा केंद्र है। अपनी दिव्यता, आध्यात्मिक ऊर्जा और पुरानी वास्तुकला के लिए मशहूर मंदिर का जिक्र कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है, जिसमें स्कंद पुराण भी शामिल है, जो इस जगह के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को बताता है। श्रावण के पवित्र महीने में देवभूमि उत्तराखंड की अपनी यात्रा के दौरान श्री जागेश्वर महादेव के दर्शन का पुण्य जरूर पाएं।”

श्री जागेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में देवदार के घने जंगलों और जटा गंगा नदी के किनारे बसा पावन धाम ‘श्री जागेश्वर महादेव मंदिर’ लगभग 2500 साल पुराना माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से गुप्त काल के बाद और मध्यकाल से पहले कत्युरी राजाओं द्वारा किया गया था।

मान्यता है कि यहां सप्तऋषियों ने लंबे समय तक तपस्या की थी। 8वीं शताब्दी में केदारनाथ जाने से पहले आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां आकर ध्यान लगाया था और इन मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया था। इस मंदिर में मुख्य रूप से शिव जी के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है, जिन्हें (बाल जागेश्वर) कहते हैं।

यहां का सबसे पुराना मंदिर 8वीं सदी का मृत्युंजय मंदिर है। इसके बाद जागेश्वर, नवदुर्गा, कालिका, प्यूष्टिदेवी, बालेश्वर और कुछ छोटे मंदिर बने। ये सभी शुरुआती कत्यूरी राजाओं ने बनवाए थे। बाद के कत्यूरियों ने 11वीं और 14वीं सदी के बीच सूर्य, नवग्रह और नीलकंठेश्वर मंदिर बनवाए। पांच छोटे मंदिर गरुड़ ज्ञान चंद के राज के बताए जाते हैं।

Exit mobile version