July 27, 2026
National

’16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध’, अंबुमणि रामदास का केंद्र से आग्रह

‘Ban social media for children under 16’: Anbumani Ramadoss urges the Centre.

पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) के अध्यक्ष डॉ. अंबुमणि रामदास ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए देशव्यापी कानून बनाए। उनका तर्क है कि बच्चों की शारीरिक सेहत, मानसिक भलाई और पढ़ाई-लिखाई से जुड़े भविष्य की सुरक्षा के लिए ऐसा कदम उठाना जरूरी है।

एक बयान में अंबुमणि ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने के फ्रांस के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने इसे युवाओं को ज्यादा डिजिटल इस्तेमाल के बुरे असर से बचाने की दिशा में एक अहम कदम बताया। फ्रांसीसी संसद ने हाल ही में इस कानून को मंजूरी दी है। इसके तहत सितंबर से 15 साल से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया अकाउंट नहीं बना पाएंगे। साथ ही, इस उम्र के बच्चों के मौजूदा अकाउंट जनवरी से सस्पेंड कर दिए जाएंगे, जब यह कानून पूरी तरह लागू हो जाएगा।

अंबुमणि ने बताया कि फ्रांस यूरोपीय संघ का पहला देश बन गया है जिसने ऐसी पाबंदी लागू की है। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया पहला देश था जिसने पूरे देश में ऐसी ही पाबंदी लगाई थी, जो दिसंबर 2025 में लागू हुई थी। उन्होंने आगे कहा कि कनाडा, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों ने भी ऐसे ही उपाय अपनाए हैं, जबकि यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, ग्रीस, जर्मनी और डेनमार्क समेत 50 से ज्यादा देश ऐसी ही पाबंदियों पर विचार कर रहे हैं।

उन्होंने भारत का जिक्र करते हुए कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूरे देश में रोक लगाने के ठोस कारण हैं। माता-पिता ने बार-बार चिंता जताई है कि बच्चे ऑनलाइन गलत और अश्लील कंटेंट के संपर्क में आ रहे हैं, जिससे उनका ध्यान भटकता है, व्यवहार में बदलाव आता है और दूसरी मनोवैज्ञानिक समस्याएं होती हैं।

उन्होंने 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण का भी हवाला दिया, जिसमें बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर सोशल मीडिया के ज्यादा इस्तेमाल के बुरे असर को उजागर किया गया था। सर्वेक्षण के अनुसार, लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से एंग्जायटी (बेचैनी), तनाव, आत्मविश्वास में कमी और साइबर बुलिंग जैसी समस्याएं होती हैं। इसमें 16 से 24 साल के युवाओं को सबसे ज्यादा जोखिम वाला माना गया है।

सर्वेक्षण में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को रेगुलेट करने और गैर-जरूरी ऑनलाइन गतिविधियों को कम करने की भी सलाह दी गई। अंबुमणि ने आगे कहा कि शिक्षकों और यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेटर्स ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया की लत से छात्रों का ध्यान लगाने की क्षमता, पढ़ने की आदतें और पढ़ाई-लिखाई का प्रदर्शन कम हो रहा है।

उन्होंने कहा कि ऑनलाइन दिखाए जाने वाले चुनिंदा कंटेंट से लगातार तुलना करने पर आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान कम होता है और ध्यान लगाने की क्षमता भी घटती है। स्टडीज से पता चला है कि कई युवा यूजर्स आठ सेकंड के अंदर ही वीडियो में दिलचस्पी खो देते हैं, जो ध्यान केंद्रित करने की घटती क्षमता को दिखाता है।

उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि बच्चे क्रिकेट और कबड्डी जैसे आउटडोर खेल कम खेल रहे हैं और उनकी जगह ऑनलाइन गेमिंग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस बदलाव की वजह से बच्चों में मोटापा और विटामिन डी की कमी बढ़ रही है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गोवा ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को रेगुलेट करने की योजना का ऐलान किया है, लेकिन अंबुमणि का तर्क है कि राज्यों के पास ऐसी पाबंदियां लगाने का संवैधानिक अधिकार नहीं हो सकता, क्योंकि कम्युनिकेशन संविधान की ‘यूनियन लिस्ट’ (केंद्र सूची) के तहत आता है।

उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर लगाई गई किसी भी पाबंदी को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ठोस कदम उठाने की मांग करते हुए, पीएमके नेता ने केंद्र सरकार से फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण अपनाने और ऐसा कानून लाने का आग्रह किया, जिससे पूरे भारत में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल बैन हो सके, ताकि उनकी सेहत, शिक्षा और भविष्य के विकास की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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