July 29, 2026
National

यूपी के पूर्व डीजीपी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का किया समर्थन, हिंसक तत्वों पर सख्त कार्रवाई की वकालत

Former UP DGP supports Supreme Court directives, advocates strict action against violent elements.

। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन और उस दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों और निर्देशों पर उत्तर प्रदेश के दो पूर्व पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) ने टिप्पणी करते हुए न्यायालय के फैसले का समर्थन किया है। दोनों पूर्व डीजीपी ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा, कानून-व्यवस्था भंग करने और आपराधिक तत्वों को किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा सकती।

नोएडा में पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि जिन लोगों ने हिंसा की है या जो आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहे हैं, उनके प्रति किसी भी प्रकार का दोहरा मापदंड नहीं अपनाया जाएगा और न ही उन्हें किसी तरह का संरक्षण मिलेगा। न्यायालय का यह निर्देश कानून के शासन को मजबूत करने वाला है।

विक्रम सिंह ने सीजेपी की उस प्रतिक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें कथित तौर पर कहा गया कि यदि प्रशासनिक आदेश के माध्यम से सभी मामलों को वापस नहीं लिया गया तो दोबारा धरना दिया जाएगा। उन्होंने इसे सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना बताते हुए कहा कि इस प्रकार की भाषा यह संकेत देती है कि कुछ लोग स्वयं को कानून से ऊपर समझते हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश सभी के लिए बाध्यकारी होते हैं और यदि किसी पक्ष को अदालत का निर्णय स्वीकार नहीं है, तो उसके पास कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। ऐसे मामलों में अदालत में पुनर्विचार याचिका या अन्य वैधानिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, न कि सड़कों पर उतरकर दबाव बनाने की कोशिश की जानी चाहिए।

पूर्व डीजीपी ने शासन-प्रशासन और पुलिस से भी अपील की कि वे हर संभावित परिस्थिति के लिए तैयार रहें, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दौरान संयम बरतें। बिना अनावश्यक बल प्रयोग और बिना हिंसा के स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास होना चाहिए, क्योंकि पुलिस जनता की शत्रु नहीं है।

वहीं, लखनऊ में पूर्व डीजीपी एके जैन ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का स्वागत किया, जिसमें अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन संविधान प्रदत्त अधिकार है और अत्यधिक बल प्रयोग के मामलों में कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत का निर्णय संतुलित और सुविचारित है। यदि प्रदर्शन की आड़ में शामिल आपराधिक तत्वों को भी बिना जांच के राहत दे दी जाएगी, तो इससे भविष्य में गलत संदेश जाएगा। हत्या, दुष्कर्म, नारकोटिक्स जैसे गंभीर मामलों में आरोपी या हिस्ट्रीशीटर यदि प्रदर्शनों में शामिल होकर हिंसा फैलाते हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, तो इससे असामाजिक तत्वों का मनोबल बढ़ेगा।

उन्होंने दावा किया कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम के आधार पर दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में लगभग 2800 ऐसे लोगों की पहचान की गई है, जो विभिन्न आपराधिक मामलों में आरोपी या हिस्ट्रीशीटर बताए गए हैं। यह गंभीर जांच का विषय है कि लंबे समय तक शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा छात्र आंदोलन अचानक हिंसक कैसे हो गया और उसमें ऐसे तत्व कैसे शामिल हो गए।

पूर्व डीजीपी ने आगे कहा कि यदि किसी आंदोलन में बाहरी आपराधिक तत्व घुसकर पथराव, हिंसा और कानून-व्यवस्था को प्रभावित करते हैं तो उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य के लिए एक स्पष्ट नजीर स्थापित हो सके। इससे यह संदेश जाएगा कि लोकतांत्रिक विरोध के नाम पर हिंसा और अराजकता को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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