हाल ही में कुल्लू जिले की तीर्थन घाटी के शांत वातावरण में पवित्र फागली त्योहार को समर्पित एक सांस्कृतिक संरक्षण फिल्म की शूटिंग की गई, जिसमें परंपरा, बचपन की मासूमियत और समावेश का सशक्त संदेश समाहित है। इस परियोजना का निर्देशन मुंबई के जाने-माने फिल्म निर्देशक शहबाज ने किया, जिनके साथ फिल्म निर्माता सिद्धार्थ ने भी अपनी संवेदनशीलता से कहानी को फिल्माया। यह फिल्म फागली को एक बच्चे की नजर से प्रस्तुत करती है, जो सामाजिक चेतना के साथ सांस्कृतिक निरंतरता का एक दुर्लभ और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है।
फागली उत्सव हिमाचल प्रदेश, विशेषकर कुल्लू क्षेत्र के लोगों के लिए आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुल्लू के जीवित देवताओं के प्रति श्रद्धा से ओतप्रोत यह उत्सव कठोर शीत ऋतु के अंत और वसंत ऋतु के सुखद आगमन का प्रतीक है। यह वह समय है जब समुदाय एकजुट होकर आस्था को मजबूत करते हैं, ऋतु के नवीनीकरण का जश्न मनाते हैं और सद्भाव के बंधन को सुदृढ़ करते हैं। अनुष्ठानों, गीतों और सामूहिक भागीदारी के माध्यम से, फागली उत्सव लचीलेपन, कृतज्ञता और साझा विरासत का प्रतीक है।
यह फिल्म तीर्थन घाटी में स्थित महिला हाट ग्रामीण पुस्तकालय-सह-नवाचार केंद्र में फिल्माई गई थी, जो जमीनी स्तर पर विकसित एक ऐसा केंद्र है जो शिक्षा और सशक्तिकरण का केंद्र बन गया है। कहानी के केंद्र में नौ वर्षीय एक दिव्यांग बच्ची है, जो महिला हाट की एक सक्रिय सदस्य है। फागली पर्व के अवसर पर कविता पाठ की तैयारी करते हुए, उसकी मासूमियत, जिज्ञासा और सांस्कृतिक गौरव से भरी कहानी उसी के नजरिए से आगे बढ़ती है।
उनकी कहानी कहने की शैली दर्शकों को इस उत्सव को केवल एक तमाशे के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत भावना के रूप में अनुभव करने का अवसर देती है। कास्टिंग डायरेक्टर कुणाल द्वारा चयनित एक सात वर्षीय लड़का सहायक भूमिका में नजर आता है, जिससे बाल-केंद्रित कहानी और भी अधिक प्रामाणिक हो जाती है।
फिल्म की टीम को साहिल और प्रिया, सौरभ, क्रुणाल और अंकित राज से भरपूर स्थानीय सहयोग मिला। बंजार ब्लॉक के महिला हाट के समन्वयक टेक राम ने इस परियोजना को घाटी और कुल्लू जिले के लिए गौरव का क्षण बताया। उनका कहना है कि निर्देशक की मुंबई से की गई यात्रा ने सम्मानजनक कहानी कहने के माध्यम से स्थानीय विरासत को संरक्षित करने के महत्व को रेखांकित किया।

