देश में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर चर्चा तेज हो गई है। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा कि इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना है। उन्होंने बताया कि लोकसभा ने इस विधेयक को 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया है। समिति इस प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श कर रही है और उन संभावनाओं का अध्ययन कर रही है, जिनके माध्यम से राष्ट्रीय और राज्य स्तर के चुनाव एक साथ सफलतापूर्वक कराए जा सकें।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि समिति इस व्यवस्था को लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक, राजनीतिक और व्यावहारिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर रही है। इसके साथ ही विभिन्न पक्षों से सुझाव भी लिए जा रहे हैं ताकि चुनावी प्रक्रिया को सुचारु और प्रभावी बनाया जा सके।
यह पूछे जाने पर कि भारत में 1951 से 1967 के बीच एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था क्यों समाप्त हो गई, पीपी चौधरी ने कहा कि वर्ष 1952 से 1967 के बीच देश में चार आम चुनाव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ कराए गए थे। उस समय चुनावों का समय एक जैसा बनाए रखने के लिए आठ से नौ राज्यों की विधानसभाओं को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग कर दिया गया था। ऐसा इसलिए किया गया था, ताकि लोकसभा के साथ ही संबंधित राज्यों में विधानसभा चुनाव भी कराए जा सकें।
उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि उस समय संविधान निर्माताओं और संविधान सभा के सदस्यों की सोच में भी एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था का विचार शामिल था। यदि संविधान की भावना, उद्देश्य और मूल मंशा को समझा जाए तो वह ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की अवधारणा की ओर संकेत करती है। इसी सोच के तहत उस दौर में कुछ राज्य विधानसभाओं को समय से पहले भंग करके लोकसभा के साथ चुनाव कराए गए थे।
समिति के कामकाज और अब तक हुई बैठकों की जानकारी देते हुए पीपी चौधरी ने बताया कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर गठित उच्चस्तरीय समिति अब तक दिल्ली में 25 बैठकें कर चुकी है। इसके अलावा समिति ने लगभग 10 राज्यों का दौरा कर विभिन्न हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया है।
उन्होंने बताया कि इन दौरों के दौरान उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, नागरिक समाज संगठनों, राजनीतिक दलों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से बातचीत की गई। इनमें राज्यों के मुख्य सचिवों और विभिन्न विभागों के सचिवों के साथ-साथ मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री तथा विधानसभा अध्यक्ष भी शामिल रहे।
चौधरी ने कहा कि इन सभी जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और संगठनों ने अपने अनुभव के आधार पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। उनके विचारों और दृष्टिकोण से समिति को इस प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं को समझने तथा अपनी रिपोर्ट तैयार करने में काफी मदद मिली है।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ समिति के अध्यक्ष ने बताया कि एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव को लेकर अक्सर यह आशंका जताई जाती है कि इससे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव कम हो सकता है। इसके अलावा यह भी सवाल उठाया जाता है कि इस व्यवस्था से देश के संघीय ढांचे और संविधान के मूल स्वरूप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
पीपी चौधरी ने बताया कि विशेषज्ञों ने वर्ष 1967 से लेकर 2024 तक के चुनावी इतिहास का हवाला देते हुए अपनी बात रखी। इसमें 1967, 1971, 1977, 1980, 1984 और 1989 के चुनावों के साथ-साथ 1989 से 2014 तक गठबंधन सरकारों के दौर तथा 2014, 2019 और 2024 के चुनावों का भी विश्लेषण किया गया।
उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों के अनुसार, जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, तो केंद्र में मजबूत सत्ताधारी दल कई बार राज्यों के चुनावों में भी बड़ी जीत हासिल कर लेते हैं। इससे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए अपनी स्थिति मजबूत करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उन्होंने कहा कि समिति विभिन्न विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों से मिले सुझावों का अध्ययन कर रही है। इसका उद्देश्य ऐसी चुनावी व्यवस्था तैयार करना है, जिससे देश में चुनाव प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सके और राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती मिले।

