October 9, 2026
Haryana

सीबीआई अदालत ने हरियाणा के उस अधिकारी की जमानत याचिका खारिज कर दी, जिसका फोन नंबर 504 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी से प्रभावित खातों में दर्ज था।

पंचकुला स्थित सीबीआई विशेष न्यायालय ने हरियाणा पंचायत निदेशालय के अधीक्षक प्रिंस शर्मा की सरकारी निधि से लगभग 504 करोड़ रुपये के कथित गबन के मामले में दायर नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। सीबीआई का कहना है कि उनका निजी मोबाइल नंबर कुछ खातों में पंजीकृत संपर्क के रूप में दर्ज था, जिनके माध्यम से धोखाधड़ी से धनराशि निकाली गई थी।

सीबीआई के विशेष न्यायाधीश विजयंत सहगल ने कहा कि आरोपों की प्रकृति, अपराध की गंभीरता, शर्मा पर लगाए गए आरोपों में उनकी भूमिका और लंबित आगे की जांच को देखते हुए, इस स्तर पर जमानत का कोई आधार नहीं बनता है। चंडीगढ़ निवासी 47 वर्षीय शर्मा 18 जून से हिरासत में हैं।

सीबीआई के अनुसार, शर्मा का नंबर आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में पंचायत निदेशालय के खातों के लिए पंजीकृत था। इसका इस्तेमाल पंचकुला नगर निगम के खाते के लिए भी किया गया था, जहां से बड़ी रकम निकाली गई थी, जबकि उनका उस संस्था से कोई संबंध नहीं था। इन खातों से लगभग 160 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की गई।

सीबीआई का आरोप है कि खाता खोलने और धोखाधड़ी से किए गए डेबिट से संबंधित अलर्ट उनके नंबर पर भेजे गए, जिससे विभागों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं से लेनदेन छिपाए गए। एक्सिस बैंक में तीसरे खाते में अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का नंबर इस्तेमाल किया गया था, और वहां किसी प्रकार की धोखाधड़ी की सूचना नहीं मिली। अदालत ने गौर किया कि इस स्तर पर इस बात का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं है कि शर्मा के नंबर का इस्तेमाल इन दोनों खातों में क्यों किया गया।

सीबीआई ने हरियाणा राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार-विरोधी विभाग से यह मामला अपने हाथ में लिया और 8 अप्रैल को इसे पुनः पंजीकृत किया। आरोप है कि निजी व्यक्तियों और कुछ सरकारी अधिकारियों के साथ मिलीभगत करने वाले बैंक अधिकारियों द्वारा हरियाणा के कई विभागों के फंड धोखाधड़ी से निकाले गए और फर्जी संस्थाओं में ट्रांसफर किए गए। सीबीआई का यह भी कहना है कि 13 अक्टूबर से 11 नवंबर, 2025 के बीच शर्मा के फोन में सिम कार्ड था, इसी दौरान कई अनधिकृत डेबिट हुए।

शर्मा के वकील संजय वर्मा ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है और ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें लापरवाही का दोषी माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि खातों के संचालन में शर्मा की कोई भूमिका नहीं थी और न ही कोई धन संबंधी सुराग उनके खिलाफ जाता है। बचाव पक्ष ने कहा कि उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर सिम कार्ड सौंप दिया था, जिसका समर्थन आंतरिक विभागीय जांच और सह-आरोपी नरेश कुमार के बयान से होता है।

अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि शर्मा का नंबर नगर निगम खाते में कैसे आया। अदालत ने माना कि सह-आरोपी का बयान और आंतरिक जांच रिपोर्ट जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों को नकार नहीं सकते, और अभियोजन पक्ष ने प्रथम दृष्टया साजिश में उनकी सक्रिय संलिप्तता की ओर इशारा किया है। सिम का दुरुपयोग दूसरों द्वारा किया गया था या शर्मा ने इसे सौंपा था, यह फैसला मुकदमे के लिए छोड़ दिया गया है।

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि बड़े पैमाने पर किए गए वित्तीय अपराधों के साथ भी अन्य गंभीर अपराधों के समान ही व्यवहार किया जाना चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि उसकी ये टिप्पणियां मामले की खूबियों पर कोई राय व्यक्त नहीं करती हैं और मुकदमे के दौरान किसी भी पक्ष के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखेंगी।

सीबीआई के वरिष्ठ लोक अभियोजक जसविंदर कुमार भट्टी और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के वकील समीर सेठी ने भी याचिका का विरोध किया। शर्मा और अन्य आरोपियों के खिलाफ अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है, लेकिन आगे की जांच और धन के स्रोत का पता लगाने का काम जारी है।

हरियाणा सरकार के खातों में हुई धोखाधड़ी के साथ-साथ चंडीगढ़ प्रशासन के दो विभाग भी प्रभावित हुए। कुल मिलाकर, आरोपी बैंकर्स और सरकारी अधिकारियों ने 657 करोड़ रुपये की हेराफेरी की।

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