June 4, 2026
Entertainment

जब लेखक के नाम पर चलती थीं फिल्में: पोस्टर्स पर लिखा होता था ‘पंडित मुखराम शर्मा की फिल्म’

When films were released in the name of the author: posters used to say ‘Pandit Mukhram Sharma’s film’

भारतीय सिनेमा में आज अभिनेता और निर्देशक सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं, लेकिन लेखक भी इसका एक मजबूत स्तम्भ होता है। एक दौर ऐसा भी था जब फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा आधार उनके लेखक हुए करते थे। उस दौर में एक नाम ऐसा था, जिसकी मौजूदगी ही फिल्म के सफल होने की गारंटी मानी जाती थी। यह नाम था पंडित मुखराम शर्मा का।

पंडित मुखराम शर्मा ने हिंदी सिनेमा में कहानी, पटकथा और संवाद लेखन को नई पहचान दिलाई। उन्होंने सिर्फ फिल्मों की स्क्रिप्ट नहीं लिखी, बल्कि लेखकों को वह सम्मान दिलाया जो पहले शायद ही किसी को मिला था। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिल्म के पोस्टरों पर बड़े अक्षरों में “पंडित मुखराम शर्मा की फिल्म” लिखा जाता था।

पंडित मुखराम शर्मा का जन्म 30 मई 1909 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के परीक्षितगढ़ क्षेत्र के गांव पूठी में हुआ था। वे हिंदी और संस्कृत के अच्छे जानकार थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मेरठ में शिक्षक के रूप में काम शुरू किया। हालांकि, उनका मन फिल्मों और लेखन की दुनिया में ज्यादा लगता था। उन्हें कहानी और कविताएं लिखने का शौक था, और धीरे-धीरे उन्होंने फिल्मों के लिए लिखने का सपना देखना शुरू कर दिया।

साल 1939 में वह अपने परिवार के साथ मुंबई पहुंचे, लेकिन शुरुआती दिनों में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। काम न मिलने की वजह से वह पुणे चले गए, जहां मशहूर फिल्मकार वी. शांताराम की प्रभात फिल्म कंपनी में उन्होंने कलाकारों को हिंदी उच्चारण सिखाने का काम किया। इस काम के बदले उन्हें मामूली वेतन मिलता था, लेकिन यहीं से उनकी फिल्मी यात्रा ने दिशा पकड़ी।

मुखराम शर्मा को फिल्मों में पहला बड़ा मौका साल 1942 में मिला, जब उन्होंने फिल्म ‘दस बजे’ के लिए गीत और संवाद लिखे। फिल्म सफल रही, और इसके बाद उन्हें लगातार काम मिलने लगा। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली। ‘विष्णु भगवान’, ‘नल-दमयंती’, ‘औलाद’, ‘एक ही रास्ता’, ‘साधना’, ‘धूल का फूल’, ‘वचन’, ‘संतान’ और ‘अभिमान’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के शानदार लेखकों में शामिल कर दिया।

साल 1959 में रिलीज हुई ‘धूल का फूल’ खास तौर पर चर्चा में रही। यह यश चोपड़ा की बतौर निर्देशक पहली फिल्म थी, और इसकी कहानी, पटकथा व संवाद पंडित मुखराम शर्मा ने लिखे थे। इसके अलावा, उन्होंने दक्षिण भारत के बड़े बैनरों के लिए भी कई सफल हिंदी फिल्में लिखीं। ‘घराना’, ‘गृहस्थी’, ‘हमजोली’, ‘जीने की राह’, ‘राजा और रंक’ जैसी फिल्मों की सफलता में उनकी लेखनी का बड़ा योगदान रहा।

उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे पारिवारिक और सामाजिक कहानियों को बेहद सरल और भावनात्मक अंदाज में पेश करते थे। उनकी कहानियां आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी होती थीं, इसलिए दर्शक उनसे आसानी से जुड़ जाते थे।

पंडित मुखराम शर्मा को उनके शानदार योगदान के लिए कई बड़े सम्मान भी मिले। उन्हें ‘औलाद’, ‘वचन’ और ‘साधना’ जैसी फिल्मों के लिए तीन फिल्मफेयर पुरस्कार दिए गए। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इतनी सफलता और लोकप्रियता मिलने के बावजूद पंडित मुखराम शर्मा बेहद सादगी भरा जीवन जीते थे। उन्होंने तय किया था कि 70 वर्ष की उम्र के बाद वह फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बना लेंगे, और उन्होंने ऐसा ही किया।

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