June 4, 2026
National

गोरखपुर लौट चुके थे योगी, तभी आया अमित शाह का फोन और सब कुछ बदल गया, सीएम बनने की वो कहानी

Yogi had returned to Gorakhpur, then Amit Shah’s call came and everything changed, that story of becoming the CM.

4 जून । मंदिरों के परिसरों में गोरक्षपीठाधीश्वर का योग और मंदिर की दहलीज लांघते ही राजयोग, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यानी वो शख्सियत जिनके नाम से गुंडे-माफिया कांपते हैं, जिनकी नीति पूरे देश में हिट है और जिनका मॉडल हर राज्य अपनाना चाहता है। एक बेहतरीन राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अपने धर्म का कर्तव्यनिष्ठा से पालन करने वाले योगी आदित्यनाथ आज भारतीय राजनीति का वो नाम बन चुके हैं कि लोग उन्हें देश के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री कहते हैं।

5 जून 1972 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले स्थित यमकेश्वर तहसील के पंचूर गांव में जन्मे अजय सिंह बिष्ट यानी योगी आदित्यनाथ आज कॉमरेड होते, अगर उनके जीजा की चली होती। योगी आदित्यनाथ का मन स्कूल के दौर से ही सियासत में लगना शुरू हो चुका था। वे एबीवीपी के सदस्य बने, और छात्रसंघ चुनाव के दौरान सचिव पद के लिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी ठोकी लेकिन टिकट नहीं मिला। अजय सिंह बिष्ट निर्दलीय मैदान में उतर पड़े। वे इस चुनाव में हार चुके थे लेकिन दिलचस्प यह था कि अजय सिंह बिष्ट की बहन के देवर यानी रिश्ते में जीजा लेफ्ट छात्र संगठन एसएफआई के सदस्य हुआ करते थे। वे चाहते थे कि युवा अजय एसएफआई ज्वाइन करे लेकिन उसी दौरान अजय सिंह बिष्ट की मुलाकात एबीवीपी कार्यकर्ता प्रमोद रावत से हुई। उन्हीं के कहने पर अजय सिंह बिष्ट ने एबीवीपी ज्वाइन कर लिया।

2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। महीनों कड़ी मेहनत, प्रदेशभर के दौरे के बाद जब चुनाव प्रचार और वोटिंग खत्म हो चुकी थी, योगी आदित्यनाथ एक हफ्ते का ब्रेक लेना चाहते थे। उन्हें विदेश जाने का ऑफर भी मिल चुका था क्योंकि वे उस समय एक सांसद थे। यह ऑफर उन्हें विदेश मंत्रालय की टीम ने दिया था, जो स्पेन जाने वाली थी। दिलचस्प यह था कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस टीम के दौरे से योगी आदित्यनाथ का नाम निकाल दिया था। योगी आदित्यनाथ को शायद कुछ अंदाजा नहीं था कि उनका नाम क्यों बाहर किया गया। अब वे गोरखपुर जाने का अपना प्लान बना चुके थे लेकिन वक्त उनके लिए कुछ और तय कर चुका था।

चुनाव नतीजे आने थे और भाजपा पूरी तरह आश्वस्त थी कि इस बार उत्तर प्रदेश में सपाइयों को पछाड़कर वह सत्ता पर काबिज होने में सफल होगी। उधर, योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर निकलने से पहले उनके पास एक फोन आया और यह फोन उस समय की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का था, जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का संदेश योगी तक पहुंचाया था। तब भी योगी को अंदाजा नहीं था कि उनका नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सोचा जा रहा है।

11 मार्च 2017 को घोषित हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था। कुल 403 सीटों में से भाजपा ने अकेले 312 सीटें जीतीं और सहयोगियों समेत कुल 325 सीटें हासिल करके ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। नतीजों के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा के अंदर अनेक नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उठने लगे थे, जिसमें योगी आदित्यनाथ का नाम बहुत पीछे था। इधर, योगी भी गोरखपुर लौट चुके थे, तभी उन्हें अमित शाह का फोन आया, जो उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। योगी आदित्यनाथ के दिल्ली उपस्थित होने के लिए वे चार्टर्ड की व्यवस्था कर चुके थे और तय बातचीत के हिसाब से योगी भी दिल्ली पहुंच गए।

18 मार्च की सुबह योगी की मुलाकात दिल्ली में अमित शाह से उनके आवास पर हुई। यह वह मुलाकात थी, जहां अमित शाह बता चुके थे कि योगी आदित्यनाथ ही उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री होंगे। हालांकि, अमित शाह ने सीएम योगी से यह बात अभी गुप्त रखने के लिए बोल दिया था। उत्तराखंड में नई सरकार गठित हो रही थी, उसी बीच लखनऊ में सीएम चेहरे पर मंथन था। भाजपा विधायक दल की बैठक हुई, जिसमें योगी आदित्यनाथ का नाम मुख्यमंत्री के रूप में घोषित हुआ। पूरी कहानी का खुलासा पहली बार खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक न्यूज पोर्टल को दिए इंटरव्यू में किया था।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश चुनाव नतीजों से महीनों पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने की पटकथा लिख चुका था। याद हो कि मार्च 2016 में गोरखनाथ मंदिर में भारतीय संत समाज की चिंतन बैठक हुई थी। कहा जाता है कि इसी बैठक में आरएसएस के बड़े नेताओं की मौजूदगी में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प लिया गया था। फिर उत्तर प्रदेश में भाजपा को बहुमत मिलने पर केंद्र के लिए यह फैसला लेना और भी आसान हो चुका था।

योगी आदित्यनाथ को सही मायने में राजनीति की राह पर गुरु महंत अवैद्यनाथ ने पहुंचाया। गोरखपुर शहर के मुख्य बाजार गोलघर में छात्रों का एक दुकानदार से झगड़ा हुआ था। यह योगी आदित्यनाथ के जीवन में एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। दुकानदार के खिलाफ छात्रों में जबरदस्त आक्रोश था और उस समय विरोध प्रदर्शन में योगी आदित्यनाथ को नेतृत्व संभालने का अवसर मिल चुका था। यहां से वे ‘एंग्री यंग मैन’ बन चुके थे और छात्रों के बीच मजबूत छवि बन चुकी थी। इस झगड़े के बाद सुर्खियों में आए युवा योगी आदित्यनाथ को अवैद्यनाथ ने उसी गोरखपुर लोकसभा सीट से टिकट दिलवाया, जहां से वे खुद चार बार सांसदी जीत चुके थे।

अपने पूज्य गुरुदेव के आदेश और गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की जनता की मांग पर योगी आदित्यनाथ ने साल 1998 में पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और महज 26 साल की उम्र में संसद के सबसे युवा सांसद बने। जनता के बीच दैनिक उपस्थिति, संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले लगभग 1500 ग्राम सभाओं में प्रतिवर्ष भ्रमण व हिंदुत्व और विकास के कार्यक्रमों के कारण गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की जनता ने योगी आदित्यनाथ को अपनी पहली पसंद बनाया। परिणामस्वरूप 1999, 2004, 2009 और 2014 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ ही विजयी रहे।

आज योगी आदित्यनाथ, वो नाम है, जिसने उत्तर प्रदेश की सियासत को नई पहचान दी और अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने पर पूरा जोर लगा दिया है। ‘योगी नीति’ का असर यह है कि उसका प्रभाव दूसरे राज्यों तक भी जाता है।

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